Friday, May 31, 2019

तम्बाकू से पाना चाहते हैं छुटकारा तो अपनाएं ये तरीका

अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो स्मोकिंग करते हैं तो आपको फिक्रमंद होने की जरुरत है। तम्बाकू और तम्बाकू से बने प्रॉडक्ट्स हमारे शरीर के लिए जहर की तरह हैं। रिसर्च के मुताबिक 1 सिगरेट पीने से जिंदगी के 11 मिनट कम हो जाते हैं। यही वजह है कि तम्बाकू सेवन के कारण दुनिया में हर 6 सेकंड में 1 मौत होती है। लंबे समय तक तम्बाकू का सेवन शरीर को खोखला कर देता है। यह वात, पित्त और कफ तीनों को बढ़ाता है। इसके कारण कैंसर, दिल से जुड़ी बीमारियां, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, अल्सर आदि कई बीमारियां होती हैं। भारत में मुंह और गले के कैंसर का यह प्रमुख कारण है। दरअसल यह एक धीमा जहर है जो धीरे-धीरे इंसान की जिंदगी को मौत की तरफ धकेलता है।
झड़ते बालों से छुटकारा पाने के असरदार घरेलू उपाय।

हर साल तंबाकू की वजह से 70 लाख लोगों की मौत

WHO के आंकड़ों के मुताबिक़ तकरीबन 70 लाख लोग हर साल तम्बाकू के सेवन की वजह से असमय मौत का शिकार हो रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या ये है कि एक बार तंबाकू की की आदत हो जाने पर यह शरीर को खोखला करके ही छोड़ता है। तंबाकू में निकोटिन होता है जो हमारे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है। इसे लेने से फौरी तौर पर तो राहत महसूस होती है लेकिन जल्द ही इसकी ऐसी लत लग जाती है कि फिर इसे छोड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि तम्बाकू का सेवन करने वाले ढेरों लोग चाहकर भी इसे छोड़ नहीं पाते। लेकिन आयुर्वेद में ऐसे कुछ उपाय है जिनकी मदद से तम्बाकू सेवन की आदत से छुटकारा मिल सकता है...

अजवाइन 

तम्बाकू के नशे से मुक्ति पाने में अजवाइन बेहद कारगर आयुर्वेदिक नुस्खा है। भुनी हुई अजवाइन खाने से तम्बाकू सेवन की बेचैनी धीरे-धीरे ख़त्म होती जाती है। इससे पाचन तंत्र को फायदा होता है और गैस, अपच आदि की समस्याओं में भी राहत मिलती है।
तंबाकू को ऐसे कहें नासकारात्मक रहेंप्लान बनाकर काम करेंखुद को व्यस्त रखेंउन चीजों से दूर रहें जो इसे बढ़ाती हैंलाइफस्टाइल बदलेंकुछ चीजों के लिए रहें तैयार

अदरक

तम्बाकू खाने की जब भी इच्छा बलवती हो जाए तब अदरक को मुंह में रखें और धीरे-धीरे उसे चूसते रहें। तम्बाकू खाने या धूम्रपान करने की इच्छा पर विराम लगेगा। इसके लिए अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े करके उसमें नींबू का रस और नमक मिलाकर धूप में सुखा लें। अदरक में सल्फर होता है जो इस लत को कम करने में मदद करते है।

शहद और नींबू

नींबू के रस में शहद मिलाकर पीने से तम्बाकू के नशे की तलब दूर होती है। नींबू-पानी से शरीर से नशीले पदार्थ भी बाहर निकलते हैं।

आंवला सौंफ और इलायची

आंवला, सौंफ और इलायची के चूर्ण का मिश्रण भी नशे की लत से छुटकारा पाने में बेहद उपयोगी है। सिगरेट या तम्बाकू खाने की जब भी इच्छा हो तब इन तीनों के चूर्ण की एक पुड़िया मुंह में रखें और धीरे-धीरे इसे चबाते रहें। कुछ दिन तक ऐसा करने से नशे की तलब ख़त्म हो जायेगी। साथ ही पेट के लिए भी यह फायदेमंद है। खट्टी डकार ,भूख ना लगना, पेट फूलने में आराम मिलता है।

तुलसी

आयुर्वेद में तुलसी का विशेष महत्व है। तम्बाकू से छुटकारा पाने में भी यह विशेष उपयोगी है। सिगरेट पीने या तंबाकू खाने का जब भी मन करे तो तुलसी का पत्ता चबाएं। सुबह और शाम तुलसी के 2-3 पत्ते चबाने से नशे की लत से छुटकारा मिल सकता है।
तंबाकू को ऐसे कहें नासकारात्मक रहेंप्लान बनाकर काम करेंखुद को व्यस्त रखेंउन चीजों से दूर रहें जो इसे बढ़ाती हैंलाइफस्टाइल बदलेंकुछ चीजों के लिए रहें तैयार

योग और व्यायाम

तम्बाकू की लत पड़ने पर, उसे छोड़ना आसान नहीं होता। इसके लिए जबरदस्त इच्छाशक्ति और मानसिक दृढ़ता की जरुरत होती है। इसके लिए शरीर, मन और आत्मा का एक होना जरुरी होता है। इसके लिए योग से बेहतर कुछ भी नहीं है। शवासन से विशेष फायदा होता है। अनुलोम-विलोम भी उपयोगी है। योगासन के साथ-साथ शारीरिक व्यायाम भी करते हैं तो सोने पर सुहागा। यह तनाव को कम करता है।

शराब चीनी और कॉफी से दूरी

तम्बाकू छोड़ने का आपने निश्चय कर लिया है तो कुछ वक़्त तक शराब, चीनी और कॉफी से भी दूरी बनानी होगी। ये तीनों सिगरेट पीने की इच्छा को जागृत करते हैं।

शाकाहारी खाना

मांसाहरी और वसायुक्त खाना तम्बाकू से छुटकारा पाने की राह में बाधक है। इसमें मन का सात्विक होना जरुरी है और उसके लिए शाकाहारी भोजन जरूरी है। साथ ही पानी भी खूब पीना चाहिए। ताजा खाद्य पदार्थ खाएं और इसलिए आहार को लेकर बेहद अनुशासित होने की जरुरत है।

हर्बल चाय

हर्बल चाय पीने से भी तम्बाकू सेवन की इच्छा में कमी आती है। कैमोमाइल और ब्राह्मी मिश्रित हर्बल टी से काफी लाभ होता है।

अनानास हरड़ और लौंग

तम्बाकू खाने या धूम्रपान करने की जब भी इच्छा हो तो सूखे अनानास के एक या दो टुकड़े को शहद के साथ चबाएं। इससे फायदा होगा। भिगोकर रखी गई काली हरड़ को चूसने से भी फायदा होता है। लौंग चूसने से भी फायदा होगा।
लेकिन यह नुस्खे तभी काम आयेंगे जब तम्बाकू से छुटकारा पाने के लिए आप दृढ़ संकल्पित हो। यदि आपने एक बार पक्का इरादा कर लिया तो तम्बाकू के खिलाफ आधी जंग आप वैसे ही जीत जाते हैं।

डॉ विवेक श्रीवास्तव
जीवक आयुर्वेदा
www.jivakayurveda.com
Helpline: 7704996699

Saturday, March 16, 2019

World Sleep Day 2019: जानिए आपके लिए कितनी जरूरी है नींद, इन बातों का रखें ध्यान

World Sleep Day 2019 हर साल 15 मार्च को वर्ल्ड स्लीप-डे मनाया जाता है। वर्ल्ड स्लीप डे को वर्ल्ड स्लीप डे कमेटी ऑफ द वर्ल्ड स्लीप सोसाइटी द्वारा आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को नींद की समस्याओं के बोझ से छुटकारा दिलाना और नींद की गड़बडि़यों को लेकर लोगों को जागरूक करना होता है। इस साल वर्ल्ड स्लीप-डे का विषय ‘स्वस्थ नींद, स्वस्थ आयु’ है। वैसे तो नींद सभी को प्यारी होती है और इसके कई फायदे भी हैं। वर्ल्ड स्लीप-डे पर इससे जुड़ी कुछ जरूरी बातें बता रहे हैं जीवक आयुर्वेदा के निदेशक टी के श्रीवास्तव ।

नींद हमारे शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए प्रकृति का वरदान है। दौड़ती-भागती तनाव भरी जिंदगी में नींद का महत्व और बढ़ गया है। रोजाना की भागदौड़, आपाधापी के चक्कर में हम ठीक से खाना और सोना तक भूल गए हैं, जिसकी वजह से अनेक शारीरिक और मानसिक परेशानियां हमें घेरने लगी हैं। ट्रैफिक की रेडलाइट से लेकर मोबाइल पर बेकार के मैसेजेज, इंटरनेट और न जाने कितनी चीजें हमें व्यर्थ का तनाव देती हैं।

दिनभर की भागदौड़ के बाद हम थक कर घर वापस आते हैं तो हमें सुकून भरी और आरामदायक नींद की आवश्यकता होती है। रात में कम से कम 6 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए, जिससे अगले दिन के कामकाज के लिए अपने मस्तिष्क को तरोताजा कर सकें। इस तरह से हम अपने जीवन का एक तिहाई हिस्सा सोने में बिता देते हैं, जो हमारी सेहत के लिए बेहद जरूरी होता है।

दो तरह की नींद 
हम दो तरह की नींद लेते हैं। एक वह नींद, जिससे हम शारीरिक रूप से ज्यादा क्रियाशील रहते हैं। इसमें हमारी आंखें हिलती-डुलती रहती हैं। इस नींद में जब हम कोई स्वप्न देखते हैं तो उसे याद रख पाते हैं। दूसरी तरह की नींद में हमारी शारीरिक क्रिया न्यूनतम होती है। इस समय हम गहरी नींद में होते हैं, जिससे शरीर और मस्तिष्क को ज्यादा आराम और सुकून मिलता है। इस चैनभरी नींद से एक तरह से हमारे शरीर का उपचार होता है। लोगों के सोने की आदत अलग-अलग किस्म की होती है। कुछ लोग लंबी नींद लेने में विश्वास रखते हैं, तो कुछ थोड़े समय की नींद लेते हैं। 6 घंटे की नींद लेने वाले व्यक्ति काफी चुस्त-दुरुस्त होते हैं, जबकि 9 घंटे और इससे ज्यादा लंबी नींद लेने वाले लोग नींद के आशक्त होते हैं।

नीद न आने वाली बीमारी (अनिद्रा) 
अनिद्रा एक नींद से सम्बन्धित समस्या है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है। संक्षेप में, अनिद्रा से पीड़ित व्यक्तियों के लिए नींद आना या सोते रहना मुश्किल होता है। अनिद्रा के प्रभाव बहुत भयंकर हो सकते हैं। अनिद्रा आमतौर पर दिन के समय नींद, सुस्ती, और मानसिक व शारीरिक रूप से बीमार होने की सामान्य अनुभूति को बढाती है। मनोस्थिति में होने वाले बदलाव (मूड स्विंग्स), चिड़चिड़ापन और चिंता इसके सामान्य लक्षणों से जुड़े हुए हैं। अनिद्रा में नींद से जुड़े विकारों की एक विस्तृत श्रृंखला है, जिसमें अच्छी नींद के अभाव से लेकर नींद की अवधि में कमी से जुडी समस्याएं हैं। अनिद्रा को आमतौर पर तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता है।

अस्थायी अनिद्रा: यह तब होती है, जब लक्षण तीन रातों तक रहते हैं।
एक्यूट अनिद्रा: इसे अल्पकालिक अनिद्रा भी कहा जाता है। लक्षण कई हफ्तों तक जारी रहते हैं।
क्रोनिक अनिद्रा: यह आमतौर पर महीनों और कभी-कभी सालों तक रहती है।

दिल के लिए है खतरनाक
नींद और हृदय गति का गहरा संबंध होता है। एक ताजा में शोध में यह बात सामने आयी है। हृदय रोगियों पर किए गए ताजा अध्ययन में पाया गया कि 96 फीसदी हृदय रोगियों में नींद के दौरान श्वसन संबंधी समस्या पाई जाती है। एक अन्य अध्ययन में यह बात साफ हुई थी कि 58 प्रतिशत हृदय रोगी नींद संबंधित समस्या से ग्रसित होते हैं और इनमें से 85 फीसदी को इस समस्या तथा हृदय रोग और नींद की कमी के संबंध का पता नहीं होता।

Monday, May 14, 2018

पुरुष, पौरुष और पुरुषत्व के बीच स्वस्थ जीवन जीने की कला (भाग :३)

पुरुष के 'अन्दर की बात' 'आघात' के भय से साथ 'वात' में झूलती है।

बॉक्सर पहना जाए कि ब्रीफ़ ? कौन सा अण्डरवीयर-डिज़ायन शुक्राणु-निर्माण के लिए बेहतर है ? मौसम गरम हो तो शुक्राणु कम बनेंगे ? सर्दी में उनका उत्पादन अधिक होगा ? पहली बात कि यह सच है कि पुरुष के वृषण-कोष या स्क्रॉटम जितना मुख्य देह के समीप रहेंगे , उतना उनका ताप शरीर-जैसा होगा। शरीर जैसा यानी 37 डिग्री सेल्सियस के पास। पास यानी शुक्राणुओं की पैदावार कम। तो ज़ाहिर है कि जो अंडरगार्मेंट वृषणों को ऊपर की ओर जकड़ कर रखेगा , उसके साथ शुक्राणु-उत्पादन में कमी आ सकती है। बॉक्सर पहनना ऐसे में शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने के लिए बेहतर है। रही बात मौसम की , तो असली बात यह समझिए कि शुक्राणुओं का उत्पादन बाहर के नहीं , जिस्म के भीतर के ताप पर निर्भर है।

अगर बुख़ार होगा , वे कम बनेंगे। अगर वृषण शरीर में होंगे , उनका निर्माण कम होगा। बाहर चाहे लू चले और चाहे बर्फ़ गिरे , आदमी के शरीर का तापमान निश्चित दायरे में ही रहता है क्योंकि हम मनुष्य हैं , मेढक नहीं। हमारा ख़ून गर्म है , हम ठण्डे रक्त वाले जानवर नहीं हैं। इन दोनों बातों का सन्तान पैदा करने से क्या सरोकार , पता है ? कोई ख़ास सरोकार तब तक नहीं , जब तक आप आराम से बाप बन पा रहे हैं।

जब नहीं बन पाएँगे , तब आपकी फ़ाइल खुलेगी। शुक्राणुओं की संख्या देखी जाएगी , उनका आकार-आकृति , उनकी गति और वीर्य में अन्य तत्त्वों को भी जाँचा जाएगा। तब यह बॉक्सर-ब्रीफ़ और सर्दी-गर्मी के मायने आपके लिए महत्त्वपूर्ण हो जाएँगे। याद रखिए , एक शुक्राणु पैदा करने वाला पुरुष भी पिता बन सकता है : बस सम्भावना बहुत-बहुत-बहुत-बहुत कम होती है। संख्या में यही शक्ति है , वह सफलता सुनिश्चित कर देती है।



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 भाग १ और भाग २ भी पढ़ें

पुरुष, पौरुष और पुरुषत्व के बीच स्वस्थ जीवन जीने की कला (भाग :२)

"बात वीर्य और शुक्राणु के बीच सम्बन्ध की चल निकली थी"

 बहुधा लोग वीर्य और शुक्राणु में भेद नहीं जानते। जानने की उन्हें ज़रूरत भी नहीं लगती। वीर्य सन्तान पैदा करता है , सदियों से पता है। शुक्राणु देख लिये विज्ञान ने , तो देख लिये होंगे। कौन सा बड़ा काम किया ! साइंसवालों को तो हर काम जानबूझ कर बारीक कर के दिखाने की आदत है ताकि जता सकें कि पुराने लोगों को कुछ नहीं आता था। वीर्य को अँगरेज़ी Semen कहती है : लैटिन के Serere से निर्मित शब्द जिसका अर्थ रोपना या आरोपण करना होता है। जबकि शुक्राणु के लिए स्पर्म चलता है , जिसमें यूनानी के sperma का पुट है , जो बीज को कहा जाता है। सच तो यह है वीर्य में मात्र चार-पाँच प्रतिशत ही शुक्राणु होते हैं , शेष पच्चानवे प्रतिशत वीर्य अन्य पदार्थों से बना होता है। इन अन्य में प्रोटीन , अमीनो अम्ल , फ्रक्टोज़ नामक शर्करा , तमाम खनिज-विटामिन और रसायन आते हैं।

इनमें से एक को भी शरीर ने यों ही नहीं इस्तेमाल किया : हर पदार्थ को वह बड़े महत्त्व के कारण ही प्रयोग में लाती है। एक स्त्री जहाँ अपने सारे अण्डाणु जन्म के साथ लेकर ( लगभग सभी ! ) जन्मती है , पुरुष में वीर्य-निर्माण आजीवन चलने वाली घटना है। यह मनुष्यों के वृषणों में शरीर से बाहर दो छोटी मांसल थैलियों में घटती है , जिन्हें स्क्रॉटम नाम दिया गया है। शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में ठीक-ठीक तो नहीं पता लेकिन यह लैटिन के Scrautum से बहुत मिलता है। Scrautum तरकश या तूणीर को कहा गया जिसमें बाण रखे जाते थे। स्क्रॉटम भी पुरुषत्व के तूणीर ही हैं जिनमें शुक्राणु-रूपी बाण संचयित रहते हैं। एक सामान्य पुरुष को पिता बनाने के लिए दो वृषण आवश्यक नहीं , एक से ही इतने शुक्राणु निकलते हैं कि वह सन्तान उत्पन्न कर सकता है। शुक्राणु वृषण में बनते हैं , वहाँ से निकलकर और परिपक्व इपीडिडीमिस में होते हैं और यहीं भाण्डारित रहते हैं। कब तक के लिए ? वीर्य कोई अक्षय ऊर्जा का स्रोत नहीं। न वह ब्रह्मचर्य के कारण आजीवन भाण्डारित रह सकता है। वह बनता है प्रयोग के लिए , कुछ समय शुक्राणु इपीडिडीमिस में रखे जाते हैं।

लेकिन जब शरीर यह देखता है कि व्यक्ति इनका प्रयोग ही नहीं कर रहा तो वह इन्हें नष्ट कर के सोख लेता है।   वीर्य में शुक्राणुओं से इतर सामग्री का पच्चानवे प्रतिशत होना बताता है कि सन्तान-उत्पन्न करने वाले ये नन्हें तैराक इतना टीमटाम क्यों लेकर चलते हैं। क्योंकि आवश्यकता है। शरीर कुछ भी नाहक ही नहीं कर डालता। पुरुष सीधे वृषणों से वीर्य उत्पन्न करके भी उत्सर्जित कर सकता था। लेकिन शरीर में इपीडिडीमिस है , सेमाइनल वेसाइकल और प्रोस्टेट हैं , और भी कई ग्रन्थियाँ हैं। इन सब को जाने बिना मर्दानगी को जान लेना सम्भव नहीं। और फिर अतिशय महत्त्वपूर्ण अन्तःस्रावी तन्त्र है। वह जो स्त्रीत्व-पुरुषत्व का नियन्ता है। और फिर सबसे ऊपर मस्तिष्क है। जिसकी कोख में हर शारीरिक परिवर्तन जन्म पाता है और अपने गन्तव्य के लिए निकलता है।


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 भाग १ और भाग ३ भी पढ़ें

पुरुष, पौरुष और पुरुषत्व के बीच स्वस्थ जीवन जीने की कला (भाग :१ )

"धात की बात न उठाना बन्धु , क्योंकि वह तो सभी स्वस्थ पुरुषों के बनती है और बनती रहेगी।"

 लड़का अठारह साल का है और उसकी बुद्धि उसके गुप्तांग की जड़िता-बन्दिनी है। उसके सामने प्रेमभरे जीवन की आशाएँ हैं , अरमान हैं , उम्मीदें हैं। हर आशा-उम्मीद-अरमान के मूल में सर्जना है। हर सर्जना के केन्द्र में उसका पुंसत्व है। और पुंसत्व के मूल में उसका गुप्तांग। इसलिए वह मेरे पास वीर्य और गुप्तांग की समस्या को लेकर खुल रहा है। मैं वीर्य और गुप्तांगों का कोई विशेषज्ञ नहीं , जीवक आयुर्वेदा का डायरेक्टर हूँ। लेकिन जिस तरह से 'ऑल रोड्स लीड टु रोम' वाली कहावत चलती है , उसी तरह 'ऑल एल्मेंट्स लीड टु द जेनाइटल्स' वाली बात भी सच साबित होती है। और फिर भारत का रोगी संस्कारों में आहार-विहार की बातें सुनता आया है। उसे कोई बीमारी हो जाए , उसकी शंका अन्ततः इन्हीं दो विन्दुओं पर जा कर ठहरती है --- 'खाने में कोई परहेज़ ?' और 'धात गिरती है'। अतः हर ओ.पी.डी. में खानपान के सैकड़ों सवाल उठाये जाते हैं। हर डॉक्टर को कई बार गोपन गुप्तांग-गाथा सुननी ही पड़ती है।

पहली बात सपाट प्रश्न के रूप में प्रस्तुत की जाती है , तो दूसरी अपराधबोध से ग्रस्त स्वीकृति के साथ सामने लायी जाती है। लड़के को लगता है कि उसका शिश्न टेढ़ा है। उसे यह भी बोध हो रहा है कि उसका वीर्य पतला हो रहा है। उसे यह भी चिन्ता सता रही है कि वह हस्तमैथुन से लत से मुक्त नहीं हो पा रहा। अब वह गर्लफ़्रेंड कैसे बनाएगा ? अब शादी किस तरह हो सकेगी ? और फिर बच्चे ? लड़के से मैं कहता हूँ कि शिश्न और वीर्य परस्पर उतने सम्बद्ध नहीं है , जितना वह सोचता है। शिश्न एक पुरुष-अंग हैं , पेशाब और वीर्य को निःसृत करने का। वीर्य का काम स्त्री के अण्ड से मिलकर नये भ्रूण का निर्माण करना होता है। शिश्नहीन जन्तु भी है सृष्टि में , वीर्य उनके भी बनता है।

उन जातियों के पुरुष अपने गुप्तांग को स्त्री-शरीर में प्रविष्ट नहीं कराते , वीर्य-अण्ड का मिलन उनके यहाँ बाहर खुले में हुआ करता है। मेढक इस तरह के यौन-सम्बन्ध का सबसे बड़ा उदाहरण है। मैं उसे आगे समझाता हूँ कि शिश्न पुरुष की यौन-क्रीड़ा की जीभ है। इससे वह सेक्स-सुख की प्राप्ति कर पाता है। जिस तरह मानव की जिह्वा तमाम रसों को अपनी तन्त्रिकाओं द्वारा अनुभूत करके मस्तिष्क तक उन्हें पहुँचाती है और उनका भोग पाती है , उसी तरह यह काम शिश्न करता है। उसके अग्रिम सिरे पर , जिसे शिश्न-मुण्ड कहा जाता है , तमाम तन्त्रिकाएँ यौन-उत्तेजना को महसूस करती हैं। जिह्वा और शिश्न मात्र अनुभूतियों को बटोरने का स्थान हैं , शेष सारा काम खोपड़ी के भीतर बैठा दिमाग़ करता है। फिर मैं उससे कहता हूँ कि शिश्न की लम्बाई को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया गया है।

 वीर्य-विक्षेपण और यौन-सुख , दोनों के लिए अतिशय लम्बा पुरुष-गुप्तांग कोई गारण्टी नहीं है। स्त्री योनि-मुखांग पर वीर्य-आलेप भर से भी गर्भवती हो सकती है , कई बार सालों-साल पूर्ण प्रयास के बाद भी लोग माँ-बाप नहीं बन पाते। सेक्स का सुख मात्र गुप्तांग-प्रविष्टि पर ही नहीं अवलम्बित है , अन्य अनेक कारणों पर भी उसकी अतिशय निर्भरता है। सच तो यह है कि इस उम्र में सन्तान-वन्तान कैसे करते हैं , की उसे न तो कोई जिज्ञासा है और न जानकारी। उसका ध्यान क्रीड़ा की सफलता पर अधिक टिका है। कहीं ऐसा न हो , कि वह चूक जाए और उसकी प्रेयसी-पार्टनर उसे कच्चा समझ कर तिरस्कार-सहित त्याग दे।

लड़के ने सुना है कि वीर्य अस्थि-मज्जा में बनता है। मैंने उसे बताता हूँ कि अस्थि-मज्जा में मात्र रक्त बनता है। वीर्य का मज्जा से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं। पुराने लोगों ने मर्दानगी को क़ीमती माना होगा , इसलिए वीरता से वीर्य का सम्बन्ध जोड़ लिया। और फिर नन्हीं-नहीं सफ़ेद बूँदों की कथा को खींचते-खींचते मज्जा तक ले गये। मैं उससे कहता हूँ परम कायर के भी सैकड़ों पुत्र को सकते हैं , परम वीर भी निरबंसिया हो सकता है। परम कातर भी कामक्रीड़ा-पटु-प्रवीण होकर दसियों-सहस्रों स्त्रियों को तुष्ट कर सकता है और अतिशय प्रतापी भी केलिक्रीड़ा-भूमि का भगोड़ा साबित हो सकता है। लड़के को मैंने बता दिया है कि सेक्स एक ऑर्केस्ट्रा-प्रस्तुति है , वह भ्रमवश उसे अकेला रियाज़ समझ रहा है। और फिर वीर्य ? उसके निर्माण का सेक्स से कोई सम्बन्ध नहीं है। वीर्य नित्य बना करता है पुरुष-वृषणों में , जो चमड़ी के कोषों में नीचे झूला करते हैं। ऐसा इसलिए कि उनके शुक्राणुओं के निर्माण के लिए एक डिग्री कम तापमान की आवश्यकता होती है। इसलिए पुरुष अपने वृषण शरीर के भीतर नहीं रखता , उन्हें बाहर कोषों में स्थान देता है। लड़का यही नहीं जानता था कि वीर्य और शुक्राणुओं में क्या भेद है। मैं उसे बताता हूँ कि वीर्य में शुक्राणु होते हैं , मगर उसमें और भी बहुत कुछ होता है। तमाम रसायन , अनेक पदार्थ। फिर वीर्य कोई पतला-वतला नहीं होता। वह कोई देसी-जरसी गाय का दूध थोड़े ही है ! पुरुष की सन्तानोत्पत्ति-क्षमता वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या तय करती है , उन्ही गतिमत्ता बताती है , उनका स्वरूप तय करता है। जिसके वीर्य में जितने स्वस्थ-एथलेटिक-सुरूप शुक्राणु , वह सन्तान जनने के हिसाब से उतना श्रेष्ठ मर्द !

लेकिन शिश्न के आकार और सेक्स-क्रीड़ा से इस मर्दानगी का कोई लिंक नहीं। सेक्स एक ऑर्केस्ट्रा-प्रस्तुति है , तो शिश्न एक वाद्य-यन्त्र जिसका प्रयोग एक कला है। और यौनसुख और सन्तान-सुख उससे उपजने वाली लघुकालीन और दीर्घकालीन आनन्दप्रदायी उपलब्धियाँ। बहुत अच्छे यन्त्रों वाला बहुत अच्छा ऑर्केस्ट्रा भी कोई आनन्द न दे सके , ऐसा सम्भव है। यह भी हो सकता है कि लघुकालिक सुख देने वाला दीर्घकालिक सुख न दे पाये और दीर्घकालिक सुख देने वाला सदैव अपनी प्रेयसी-पत्नी को लघुकालिक सुख से वंचित रखे। लड़के को आज ज्ञान मिला है कि वीर्य कोई धातु नहीं जिसे सोना-चान्दी की तरह सँभाल कर तिजोरी में ताला मारकर रखा जाए। वह बनता रहता है , बनता रहेगा। तुम प्रयोग करोगे , तो निकलेगा। नहीं करोगे , तो भी समय-समय पर शरीर उसे पेशाब के रास्ते उत्सर्जित कर देगा। बहुत से शुक्राणु भीतर-भीतर ही नष्ट हो जाएँगे। शरीर उनकी सामग्री से नये शुक्राणुओं का निर्माण कर लेगा। लड़के को चाहिए कि वह हस्तमैथुन के अपराध-बोध से बाहर निकले। यौवन आया है , तो मैथुन की अपेक्षा है। यह स्वाभाविक है। उत्तेजना की आत्मतुष्टि कोई अपराध नहीं। न उससे कोई नैतिक-शारीरिक-मानसिक हानि होती है। जो इस प्रकार से से तुष्ट नहीं होते , उनके लिए सीधे सुलभ स्त्री-सहवास का मार्ग है। देह में उठते नैसर्गिक यौन-ज्वार के शमन का और कोई मार्ग नहीं। बुरी मात्र यौन-कुण्ठाएँ हैं। बुरा मात्र स्वीकृति के बिना भी स्त्री को भोग्या मान लेना है। गर्हित मात्र बलात्कार है।


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भाग २ और भाग ३ भी पढ़ें 

Friday, May 11, 2018

यौनकर्म और सन्तान उत्पत्ति

यौनकर्म का सम्बन्ध सन्तान उत्पत्ति से है , मगर कितना है यह जानना हर स्त्री-पुरुष के लिए आवश्यक है। यौन और जन्म , दोनों को जाने बिना न परिवार चलाया जा सकता और न समाज। और न ही दोनों का नियमन किया जा सकता है। आधुनिक गर्भनिरोधकों का ज़माना अपेक्षाकृत नया है। लेकिन प्राचीन काल से गर्भनिरोधकों के साथ-साथ संसार में अलग-अलग जगहों में कॉइटस इन्टरप्टस का प्रचलन था।

यौनकर्म का ऐसा ढंग , जिसमें पुरुष अपने स्तम्भित शिश्न को स्खलन से पूर्व ही बाहर कर लेता था। इस 'अधूरे' यौनकर्म में इस बात की मान्यता रहती थी कि सन्तान-उत्पत्ति कदाचित् इससे नहीं होगी। बात को समझना आवश्यक है।

यौनकर्म की उत्तेजना का चरम जिसे ऑर्गैज़्म कहा जाता है और जिसके साथ ही वीर्य योनि में स्खलित होता है का गर्भाधान से सीधा-सीधा सौ प्रतिशत का सम्बन्ध नहीं है। और यह भी जानना ज़रूरी है कि पुरुष और स्त्री में उत्तेजना के आरम्भ के साथ ही तमाम ग्रन्थियों से स्राव आरम्भ हो जाते हैं। इनका काम यौनांगों  शिश्न और योनि को स्निग्धता देना और मार्ग की अम्लीयता को घटा कर शुक्राणुओं के लिए ज़रूरी क्षारीयता बनाना होता है।

पुरुष-उत्तेजना में आरम्भिक निकला द्रव प्री-कम कहलाता है , जो बल्बोयूरेथ्रल ( काउपर ) ग्रन्थियों की उपज है। लेकिन इसमें भी कुछ शुक्राणु होते हैं , जिनके कारण स्त्री गर्भ धारण कर सकती है। निष्कर्ष स्पष्ट है : शिश्न के प्रवेश के बाद स्रावित द्रव की एक बूँद भी गर्भाधान करा सकती है। ऑर्गैज़्म के समय या उससे पहले शिश्न को बाहर कर लेना , गर्भनिरोधक के रूप में बेकार तरीका है। कोई ताज्जुब नहीं कि इसकी असफलता की दर 15-25% तक रहती है।

( क्रमशः इंटरनेट से साभार प्राप्त चित्र में अलग-अलग पुरुष-प्रजनन-ग्रन्थियों का वीर्य के अंश में योगदान। नन्हीं बल्बोयूरेथ्रल ग्रन्थियों का पानीनुमा स्राव सबसे पहले निकलता है। )


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Monday, May 7, 2018

दस्त / पेचिश या डायरिया / डिसेंट्री और एंटीबायटिक.....

दस्त लगने की दवाई आप मेडिकल-स्टोर से लेंगे , तो वह आपको लगभग हमेशा एंटीबायटिक थमाएगा।

मैं यह नहीं कहता कि दस्त / पेचिश या डायरिया / डिसेंट्री में एंटीबायटिक की कोई भूमिका नहीं है। लेकिन विना भूमिका जाने उपचार करना-कराना लक्ष्यहीन ढंग से गाड़ी चलाना-चलवाना है। और फिर डायरिया कौन सा एक रोग है। वह कौन सा एक कीटाणु , एक कारण से होता है।

सरकारें रात-दिन टी.वी.-रेडियो पर ओ.आर.एस. ( ओरल रीहाइड्रेशन सीरप ) के लिए गला यों ही नहीं फाड़ा करतीं। बालरोग-विशेषज्ञ ऐसे ही नहीं बच्चों के चलते पेट के लिए ओ.आर.एस. न होने की सूरत में तमाम घरेलू नुस्ख़े बताया करते। उसके पीछे पूरा-पूरा आन्त्र-विज्ञान काम करता है। दस्त अमूमन चाहे जिस लिए हो , उसमें होने वाली हानि का मुख्य कारण शरीर से पानी और तमाम खनिजों का मल के रास्ते निकल जाना होता है।

कीटाणुओं अथवा उनसे उत्पन्न होने वाले विषों का दुष्प्रभाव इसके बाद आता है। रोगी की स्थिति में बिगाड़ अथवा सुधार इसपर नहीं निर्भर करता कि आपने कितनी अच्छी एंटीबायटिक चला कर कितनी जल्दी कीटाणु मार दिये , बल्कि इसपर निर्भर करता है कि आपने शरीर से निचुड़ते पानी और लवणों की रोकथाम और भरपाई के लिए कितनी जल्दी क्या किया। और फिर हर कम अवधि का डायरिया बैक्टीरिया अर्थात् जीवाणुओं से नहीं होता। पाँच साल से छोटे बच्चों में 40-50 % दस्त वायरसों ( विषाणुओं ) की बदौलत होते हैं , जिनके लिए कोई एंटीबायटिक कारगर नहीं है। फिर तमाम जीवाणुओं से बनने वाले विष हैं , जो फ़ूड-पॉइज़निंग के अन्तर्गत आते हैं। अन्य परजीवी भी हैं , जो डायरिया की स्थिति पैदा कर सकते हैं। दीर्घकालिक दस्त-रोगों के कारण अलग हैं , जिनको पहचानने के लिए सुयोग्य जठर-रोग-विशेषज्ञ की आवश्यकता पड़ती है।

ऐसे में मनमर्ज़ी से एंटीबायटिक-सेवन लाभ पहुँचाने से रहा , अलबत्ता कई बार हानिकारक सिद्ध हो सकता है। कुल मिलाकर दस्त एक रोग नहीं , रोगों का एक बहुत बड़ा और जटिल समूह है। वह कबसे है , उसकी प्रकृति क्या है , उसके संग अन्य लक्षण क्या हैं --- जैसे तमाम प्रश्न उसके निदान में सहायक सिद्ध होते हैं और फिर विविध जाँचों द्वारा उसकी पुष्टि की जाती है। दस्त के मूल में व्यक्तिगत और सामाजिक अस्वच्छ वातावरण है : ध्यान हमें उसके निराकरण पर देना चाहिए। झटपट एंटीबायटिक-सेवन से हम सशक्त कीटाणुओं की एक ऐसी फ़ौज तैयार कर रहे हैं , जिसका शमन-दमन आसानी से सम्भव नहीं होगा। सुपरबग की सेना सज चुकी है और उसके निर्माण में सभी का योगदान है : रोगी , मेडिकल-स्टोरवाले और डॉक्टर भी।


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